स्कूटर और बचपन

बचपन की कुछ यादें आज फिर टेहलाई
पापा के स्कूटर के सामने खड़े, वो सवारी फिर याद आई
जब भी वो कहीं निकलते, भाग के स्कूटर पर चढ़ जाती
वो घुस्सा करते भी तो, मनमानी कर घूम आती!

स्कूटर की आवाज़ से उनके आने का पता चलता
भाग के बाहर दरवाज़ा खोलने निकल जाती
इसी स्कूटर पर स्टेशन भी छोड़ा है कई दफा
समान गोद में रख पीछे में बैठ जाती !

समय अलग है अब!

अब की बार घर गई तो गाड़ी में लेने आए थे
चेहरे पे खुशी और आंखो में चमक लिए
गाड़ी में बैठ जब उसी शहर को नई खिड़की से देखा
तो बचपन की वो झलक फिर नजर के सामने आई!

घर पहुंची तो स्कूटर बरामदे में खड़ा था
इस बार उसे खुद चलाकर शहर का एक चक्कर लगा आई
बचपन की वो यादें एक बार फिर नजर के सामने टेहलाई!

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