उड़ान – एक कविता

आज एक उड़ान भरने को जी चाहता है
यह पंख फैलाने को जी चाहता है
चीर के आसमानों को निकलना है
इस हवा को सीने से लगाने को जी चाहता है

कोई रोक रहा है मुझे मगर
काया नहीं उसकी कोई
एक एहसास है बेआवाज़ सा
कहता है ,थम जा कि अभी उड़ान का समय नहीं
जो पंख फैलाने निकली है, वो पंख अभी मज़बूत नहीं

यह पंख बने उड़ान के लिए, इनको ना रोकउंगी मैं
यह होसले बुलंद है, बेडियो से ना थमूँगी मैं

उससे यह कहने को जी चाहता है

आज एक उड़ान भरने को जी चाहता है
यह पंख फैलाने को जी चाहता है .

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